परमात्मा अब तू ले चल

Swami Antar Jashan
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मित्रों, "परमात्मा अब तू ले चल" पंक्तियाँ केवल शब्द नहीं, बल्कि एक आत्मा का स्वीकार (Confession) हैं। हम अक्सर सोचते हैं कि 'मैं' करूँगा तो ही होगा। लेकिन क्या आपने कभी गौर किया है? हमारे जीवन की सबसे बड़ी घटनाएँ—हमारा जन्म, हमारी सांसें, हमारा प्रेम—इनमें हमारा कितना हाथ था?

जब हम कहते हैं 'पाकर जिसे रिक्त रहे', तो हम उस कड़वे सच की बात कर रहे होते हैं जहाँ दुनिया की सारी दौलत और पद पाकर भी भीतर का सन्नाटा नहीं भरता। यह कविता उस 'अंतराल' (Gap) को भरने का मंत्र है। अग्नि यहाँ विनाश का नहीं, बल्कि 'परिष्कार' (Refinement) का प्रतीक है। जैसे सोना आग में तपकर कुंदन बनता है, वैसे ही हमारी आत्मा 'मर्जी के त्याग' की आग में तपकर परमात्मा के योग्य बनती है।

⏳ जीवन का यथार्थ: सपने और शून्य

जीवन के इस पड़ाव पर खड़े होकर जब पीछे मुड़कर देखता हूँ, तो हज़ारों सपनों की एक लंबी कतार दिखती है। हम सब अपनी बुद्धि के घोड़े दौड़ाते हैं, संकल्पों की दीवारें खड़ी करते हैं और पूरी ताकत झोंक देते हैं कि बस, यह एक सपना पूरा हो जाए तो शांति मिल जाएगी।

लेकिन अनुभव कुछ और ही कहता है। कुछ सपने पूरे हुए, तो लगा— "क्या बस यही था?" एक अजीब सा खालीपन भीतर बना रहा। और कुछ सपने जो अधूरे रह गए, वे रेत की तरह मुट्ठी से फिसलते रहे। अंततः, मन थककर एक ऐसे बिंदु पर आ गया जहाँ बुद्धि काम करना बंद कर देती है।

यही वह क्षण है जब हृदय से एक पुकार निकलती है:

"मेरे सपनों को देखने और उन्हें पूरा करने के बीच एक गहरा अंतराल बना हुआ है। अब यही प्रार्थना है: परमात्मा, अब तू ही ले चल।"

परमात्मा अब तू ले चल
बुद्धि की सीमा देख ली, संकल्पों की थकान भी, पाकर जिसे रिक्त रहे, देखी वह मुस्कान भी। रेत सी मुट्ठी से फिसली, हर वो हसरत जो पाली थी, भरने चले थे जो समंदर, वो गगरी आज खाली थी। अब छोड़ दी पतवार मैंने, अब तू ही खैवैया है, तू ही मांझी, तू ही किनारा, तू ही मेरी नैया है। अग्नि में जलकर शुद्ध हूँ, जलधार में बह जाऊँ मैं, ले चल जहाँ मर्जी तेरी, तुझमें ही मिट जाऊँ मैं।


अपनी अग्नि से शुद्ध होना (The Purification)

चित्र में आप देखते हैं—ऊपर एक दिव्य अग्नि प्रज्वलित है। जब इंसान कहता है "अब तू ले चल", तो वह अपनी मर्जी का त्याग करता है। यह त्याग एक अग्नि की तरह है। यह आपके पुराने 'स्व' (Ego) को जलाती है। जो राख हो जाता है, वह है आपका डर, आपकी चिंता और आपका नियंत्रण करने का मोह। इस अग्नि से गुज़रकर ही आत्मा कंचन (शुद्ध) होती है।

बोझ को बहा देना (The Flow)

नीचे बहती हुई शीतल जलधारा इस बात का प्रतीक है कि जीवन एक प्रवाह है। हम अब तक अपने कंधों पर 'कर्ता' (Doer) होने का बोझ ढो रहे थे— "मैंने किया, मैं करूँगा, मेरा क्या होगा?" जब हम परमात्मा को बागडोर सौंपते हैं, तो हम अपने उन भारी बोझों को इस दिव्य जलधारा में बहा देते हैं। अब हम तैर नहीं रहे, अब हम 'बह' रहे हैं। और प्रवाह (Flow) में कभी थकान नहीं होती।

बोध कथा: बोझ और किनारा

एक वृद्ध व्यक्ति भारी बोझ सिर पर उठाए पैदल यात्रा कर रहा था। तभी एक बैलगाड़ी वाला वहां से गुजरा और उसे गाड़ी पर बिठा लिया। पर वृद्ध ने अपना बोझ सिर से नहीं उतारा। जब बैलगाड़ी वाले ने कारण पूछा, तो वृद्ध बोला— "बेटा, गाड़ी पहले ही हम दोनों का वजन ढो रही है, मैं नहीं चाहता कि मेरे बोझ से उन बैलों को और कष्ट हो।"


💡 सार: हम भी उस वृद्ध की तरह हैं। जब परमात्मा का 'अस्तित्व' हमें ढो रहा है, तो हम अपनी चिंताओं का बोझ अपने सिर पर क्यों रखें?

स्वामी अंतर जशन का 'अमृत सूत्र'

परमात्मा, अब तू ले चल... ⚖️

✍️ लेखक के बारे में (About the Author)

स्वामी अंतर जशन एक अनुभवी ब्लॉगर और निवेशक हैं। वे Financial Education, Investment Psychology और Future Tech को सरल हिंदी में साझा करते हैं। तकनीक के साथ-साथ प्रकृति प्रेमी , भारत की प्राकृतिक धरोहरों को भी दुनिया के सामने ला रहे हैं।

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