आर्बिट्रेरी कोहेरेंस (Arbitrary Coherence): निवेश में 'मनगढ़ंत' सुसंगति का जाल
नमस्ते दोस्तों, मैं हूँ स्वामी अंतर जशन। क्या आपने कभी सोचा है कि पहली बार देखी गई कीमत हमारे दिमाग में कैसे चिपक जाती है? अर्थशास्त्र और मनोविज्ञान की भाषा में इसे आर्बिट्रेरी कोहेरेंस (Arbitrary Coherence) कहते हैं।
यह कैसे काम करता है?
इंसानी दिमाग पूरी तरह से अतार्किक है। यदि हमें किसी उत्पाद की सही कीमत नहीं पता, तो हमारा दिमाग सबसे पहले मिली संख्या को 'खूंटे' (Anchor) की तरह पकड़ लेता है। उसके बाद, हम उसी संख्या के आधार पर तुलना करते हैं, भले ही वह आधार पूरी तरह से अतार्किक हो।
निवेशक का सबसे बड़ा शत्रु
एक निवेशक के तौर पर आपकी सबसे बड़ी जीत तब होगी जब आप अपनी खरीद कीमत (Purchase Price) या इतिहास की कीमतों का मोह छोड़ देंगे। मार्केट को इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि आपने शेयर किस भाव पर खरीदा था। यदि आप ऐतिहासिक 'एंकर' के चक्कर में फँसे रहे, तो आप कभी भी कंपनी के Intrinsic Value को नहीं समझ पाएंगे।
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क्या आप शेयर गिरते देख, अपने खरीद मूल्य (Anchor) पर टिके रहते हैं?
हाँ, मैं वापसी का इंतज़ार करता हूँ! नहीं, मैं वैल्यू देखता हूँ!